कल मुंबई से अहमदाबाद ट्रेन से सफर कर रही थी। ट्रेन का नाम था गरीबरथ। स्टेशन आने के 2 किमी पहले दरवाजे के नजदीक आ कर खड़ी हो गई। तभी मेरी नज़र अचानक बाईं ओर लगे पोस्टरों में पड़ी। जो पीले कागज में काली स्याही से बड़े-बढ़े अक्षरों में समझाईश दे रहे थे। “महिलाओं को छेड़ना दण्डनीय अपराध है।” शीर्षक मुझे जरा लुभा गया तो पास जा कर पूरे पन्ने को पढ़ा। लेकिन शीर्षक जितना ही लुभावना लगा। उसके अंदर लिखा ब्यौरा उतना ही घातक था। जिसमें लिखा था! “महिलाओं को छोड़ने वाले को भारतीय पेनल कोड के तहत जेल व जुर्माना हो सकता है।”
एक ‘मात्रा’ की गलती और समाज पर इसका मनोवैज्ञानिक असर
प्रशासन को शायद यह एक साधारण प्रिंटिंग मिस्टेक (Typing Error) लगे। लेकिन एक पढ़े-लिखे समाज में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
कानून का मज़ाक:
महिला सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बनी चेतावनी इस गलती के कारण हास्यास्पद बन जाती है।
असामाजिक तत्वों में डर का खात्मा:
जो पोस्टर अपराधियों के मन में डर पैदा करने के लिए था। वह अपनी गंभीरता खो देता है।
प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण:
यह दर्शाता है कि पोस्टर छापने से लेकर चिपकाने वाले अधिकारियों तक, किसी ने भी इसे दोबारा पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई।
अभी भी आश्चर्यचकित हूं कि रेलवे को छोड़ने एवं छेड़ने में जरा भी फर्क समझ नहीं आता? या उन्हें फर्क समझ में आने के बावजूद अनदेखा कर देना उचित लगा? जाहिर सी बात है उन पोस्टरों को वही पढ़ सकेगा जिसको पढ़ने लिखने की समझ होगी। और ऐसे पढ़े-लिखे व्यक्ति द्वारा पढ़े जा रहे पोस्टर में जब वह छेड़ने को छोड़ने पढ़ेगा । तो उसकी मानसिकता पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ सकता है? इसका हम सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं! यह सवाल मैं आपके समक्ष रखती हूं। आपकी जवाबी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा। एवं रेलवे से इस चीज का जवाब चाहती हूं। उनका इस वाक्य से क्या तात्पर्य है? उन्होंने महिलाओं को छोड़ने वाले के लिये दंड क्यों निर्धारित कर रखा है?





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