स्त्री पुरुष समाज निर्माण का मुख्य स्रोत है। ये एक दूसरे के साथ परस्पर चलते हैं। किंतु बात जब अर्थव्यवस्था एवं विकास की आती है। तो पितृसत्तारुपी प्रणाली पुरुष को ही अर्थव्यवथा का मुख्य कारक मानती है। देश काल की सीमाओं से परे यह विश्वास अभी भी जड़े जमाए बैठा है कि महिलाओं का मूल काम घरेलू दायित्वों का निर्वहन ही है। आइए जानते हैं श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी घटने के मुख्य कारण।

आइए नज़र डालते हैं कुछ आंकड़ों में
अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के आंकड़ों को देखें तो २०२४ के आंकड़ें स्पष्ट करते हैं की विश्व के श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी दर लगभग 48.7% है, जो पुरुषों (73.0%) से काफी कम है।
एक समाचार कंपनी दावा करती है कि महिला श्रमिकों के स्तर के घटने का मुख्य कारण पाबंदी है। व्यापक रूप से समझा जाए तो हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव। हर तरह के भेदभाव की जड़ उनकी शारीरिक क्षमताओं को कम आंकना। साथ ही सामाजिक मोर्चे पर पीछे समझा जाना ही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के एक शोध में तथ्य सामने आया था। कोरोना महामारी के कारण पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज़्यादा बुरा असर पड़ा है।

किन्तु बस कुछ के पास ही पगार होती है।
श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी घटने के मुख्य कारण
दरअसल पुरुषवादियों के अनुसार आर्थिक संकट के समय देश की अर्थव्यवस्था पर महिलाओं से ज्यादा पुरुषों का हक है।महिलाओं पर लगी पाबंदी उन्हें बाहर जाने से रोकती है। कई महिलाओं को खूबसूरत होने का झांसा दिया जाता है। कहा जाता है कि उनकी खूबसूरती के कारण उन्हें चार दीवारी में रखा जाता है। “जब तक हीरे को सहेज कर डिब्बे में रखा जाए तब तक ही वो सुरक्षित रहता है” कथित इज़्ज़तदार समाज का एक और कथन।
निष्कर्ष
किंतु नारीवादियों के मन का सदन कहता है कि महिलाओं को आजादी चाहिए। उन्हें सहजता नहीं समानता चाहिए। उन्हें खूबसूरती के पिंजरे में नहीं समानता के खुले आसमान में उड़ना है। और मानसिक क्षमता के साथ साथ शारीरिक क्षमता के कार्य भी करना है।






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