राष्ट्रकवि दिनकर द्वारा रचित यह कविता देश में व्याप्त घोर निराशा, असमंजस और जड़ता के विरुद्ध एक ओजस्वी शंखनाद है। कवि देश की दिशाहीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति और युवाओं की लाचारी को देखकर अत्यंत व्याकुल हैं, इसलिए वे ईश्वर से शांति की नहीं, बल्कि क्रांति और शौर्य की याचना करते हैं। वे देश के युवाओं के ठंडे पड़ चुके प्राणों में ‘अंगार’ और आँखों में ‘चिंगारियाँ’ भरना चाहते हैं ताकि वे इस अंधकार रूपी संकट को चीर सकें।

अंततः कवि राष्ट्र रूपी नाव को भँवर से निकालने के लिए ईश्वर से तूफ़ानी वेग, अटूट निष्ठा और चेतना का वरदान माँगते हैं, ताकि उनका प्यारा स्वदेश पुनः गौरव और पराक्रम के मार्ग पर आगे बढ़ सके।
अनल (आग) के कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य- संग्रह सामधेनी (प्रथम प्रकाशन 1947) में संकलित आग की भीख के कुछ अंश
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज़ रो रहा है?
दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे;
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का शृंगार माँगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँधार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तम-वेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बल-पुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ, ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेरा हो रहा है।
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है;
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता है।
जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता है।
मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,
अरमान-आरजू की लाशें निकल रही हैं।
भींगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुंधरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिए कहीं से निर्भीक तेज़ ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे,
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफ़ान माँगता हूँ।
आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ शृंगी ज़रा बजा दे;
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ
फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगानेवाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ,
बेचैन ज़िंदगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उस पर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे;
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता, विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।

दिनकर की यह कविता विभिन्न रूपों में नागरिकों को प्रोत्साहित करती है।
आइए जानते हैं कविता के विभिन्न भावों को
देश की वर्तमान दुर्दशा और असमंजस पर:
“धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।”
क्रांति और युवाओं के शौर्य का आह्वान:
“प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का शृंगार माँगता हूँ।”
संकट के समय सही राह की खोज:
“तम-वेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।”
जड़ता को तोड़ने के लिए बड़े बदलाव की माँग:
“उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफ़ान माँगता हूँ।”
हताशा को आक्रोश और ऊर्जा में बदलने की प्रार्थना:
“आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ शृंगी ज़रा बजा दे;”
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