“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
अर्थात यह मेरा है, यह पराया है! ऐसी सोच छोटे दिमाग वाले लोगों की होती है। वहीं उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार के समान है।
तो क्या स्वाकथित मुंबईकर्स माने मुंबईवासी छोटा दिमाग रखते हैं या फिर उनके चरित्र में उदारता नहीं है? जो वे भाषा नामक विभिन्नता भरी भारतीय खूबसूरती को समझने में विफल हैं।
सपनों को हकीकत में बदलने के लिए प्रसिद्ध मुंबई का अवलोकन और फिल्मांकन करने आने वाले पर्यटक कैद कर ले जाते हैं कुछ ऐसी तस्वीरें! जो न सिर्फ कानूनी बल्कि नैतिक तौर पर भी अनुचित होती हैं। सोशल मीडिया पर चल रहे हालिया वीडियो ने न सिर्फ मुंबई की बल्कि पूरे देश की एवं उसकी विविधता में एकता वाली संस्कृति को धूमिल कर दिया। जी20 जैसी वैश्विक बैठक में वसुधैव कुटुम्बकम् का उपदेश देने वाले देश में जब आंतरिक एकता ही न हो। जब पूरे देश की तो बात दूर, राज्य की एक भाषा को ही एक मात्र भाषा समझ लिया जाए तो वैश्विक पटल पर ऐसी विचारधारा रखना निराधार है।
महाराष्ट्र में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी अन्य भाषी व्यक्ति के साथ बदसलूकी एवं मारपीट की गई हो। पहले भी ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं। जब किसी व्यक्ति को मात्र भाषा विशेष का ज्ञान न होने पर मार पड़ी हो। और अंत में मुख्यमंत्री फडणवीस का मीडिया में बयान कि महाराष्ट्र में मराठी सीखने का आग्रह करो बस कानून के दायरे में रहते हुए। लेकिन कुछ संस्कृति रक्षकों द्वारा आग्रह को दुराग्रह में तब्दील करने की खबर आम से एक अन्य सूचना बनकर रह गई है।
और भी भाषा विवाद के मामले
गौरतलब है कि बीते वर्ष जोधपुर मिष्ठान भंडार के मालिक बाबूलाल चौधरी को मीरा रोड में स्थित उनकी दुकान पर जाकर कुछ गैर अधिकृत कथित नेताओं ने मारा। सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने किसी भाषा विशेष को सीखने से ज्यादा अपनी दुकानदारी को तवज्जो दे दी थी।
फिर कुछ महीने बाद 18 नवंबर के दिन 19 वर्षीय छात्र अर्णव खरे को लोकल ट्रेन में बेरहमी से पीटा गया। जिसका प्रभाव उसके शरीर के साथ-साथ मानसिकी तौर पर इस कदर पड़ा कि उसको मराठी सीखने से ज्यादा सरल मार्ग आत्महत्या करना लगने लगा। और उसने अंततः सरल मार्ग अपना लिया।

किंतु इन सब के बाद भी तथाकथित मुंबई के संस्कृति रक्षकों को जरा सी भी ग्लानि नहीं हुई। और उन्होंने भाषा थोपकर मुंबई की संस्कृति को बचाने का सिलसिला जारी रखा।

कुछ समय बाद फिर खबर आई कि शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के सभी ऑटोचालकों को यह संदेश पहुंचाया कि उनके लिए मराठी बोलना अनिवार्य है। और एक ऑटोचालक के साथ बेरहमी से हुई मारपीट।
महाराष्ट्र, मराठी और मारपीट ऐसे अनुप्रास जो मिलकर बनते है भाषा विवाद की एक नई आम खबर!

महाराष्ट्र, मराठी और मारपीट यह तीन ऐसे अनुप्रास हैं कि एक साथ जुड़ते ही एक नई खबर बन जाते हैं। महाराष्ट्र में रहकर मराठी नहीं सीखी तो मारपीट हो जाएगी। यह जनसंदेश मुंबई वासी समूचे देश में फैलाना चाहते हैं। इससे वे देशभर में मराठा संस्कृति की जड़ को मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन उनको इस बात का आभास नहीं कि देश किसी एक संस्कृति का हकदार नहीं। महाराष्ट्र किसी एक भाषा का मोहताज नहीं। वो जिस संस्कृति को बचाना चाहते हैं उसकी नींव को अपने कृत्यों के ज़रिए वे कमज़ोर कर रहे हैं। साथ ही महाराष्ट्र और मराठा के साथ-साथ विश्व पटल पर वे भारत की वसुधैव कुटुंबकम् वाली संस्कृति की छवि को भी धूमिल कर रहे हैं।
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