सच्चा मनुष्य वो नहीं जिसने कभी गलत न किया हो। बल्कि वो है जो अपनी गलती स्वीकारना जानता हो। जो गलत करने पर पश्चाताप करना जनता हो। आज ईगल मीडिया काव्य शैली में हम पढ़ेंगे कैसे महाभारत के भीषण नरसंहार के बाद, जब युधिष्ठिर (धर्मराज) आत्मग्लानि, शोक और वैराग्य से भर जाते है। तब उन्हें सांत्वना और जीवन का गूढ़ सत्य का आभास होता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित कालजयी महाकाव्य ‘कुरुक्षेत्र’ से उद्धृत हैं। भीतरी कुरुक्षेत्र के अंदर हम चर्चा करेंगे उस महायुद्ध के बारे में जो बाहरी जग जीतने के बाद हमारे भीतर समाता है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित कालजयी महाकाव्य ‘कुरुक्षेत्र’
सच है, मनुज बड़ा पापी है
नर का वध करता है
पर, भूलो मत, मानव के हित
मानव ही मरता है ।
लोभ, द्रोह, प्रतिशोध, वैर
नरता के विघ्न अमित हैं
तप, बलिदान, त्याग के संबल
भी न किन्तु, परिमित हैं ।

प्रेरित करो इतर प्राणी को
निज चरित्र के बल से
भरो पुण्य की किरण प्रजा में
अपने तप निर्मल से ।
मत सोचो दिन-रात पाप में
मनुज निरत होता है
हाय, पाप के बाद वही तो
पछताता रोता है।
यह क्रंदन, यह अश्रु मनुज की
आशा बहुत बड़ी है
बतलाता है यह, मनुष्यता
अब तक नहीं मरी है ।
सत्य नहीं पातक की ज्वाला
में मनुष्य का जलना
सच है बल समेट कर उसका
फिर आगे को चलना ।
नहीं एक अवलंब जगत का
आभा पुण्य व्रती की
तिमिर-व्यूह में फंसी किरण भी
आशा है धरती की ।

फूलों पर आँसू के मोती
और अश्रु में आशा
मिट्टी के जीवन की छोटी
नपी-तुली परिभाषा ।
आशा के प्रदीप को
जलाए चलो धर्मराज,
एक दिन होगी मुक्त
भूमिरण-भीति से ।
भावना मनुष्य की न
राग में रहेगी लिप्त,
सेवित रहेगा नहीं
जीवन अनीति से ।
हार से मनुष्य की
न महिमा घटेगी और,
तेज न बढ़ेगा किसी
मानव की जीत से ।
स्नेह-बलिदान होंगे
माप नरता के एक,
धरती मनुष्य की
बनेगी स्वर्ग प्रीति से ।





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