Indian Press Emergency 1975: प्रेस की आज़ादी पर सबसे बड़ा प्रहार, जब अखबारों के पन्नों पर लगा ‘सेंसर’ का पहरा!, जानिए लोकतंत्र के उस काले अध्याय की कहानी

Indian Press Emergency 1975 Black Day Censorship
Emergency 1975 India

Emergency 1975 India: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून की तारीख एक काला दाग है। साल 1975 में आज ही के दिन देश में आपातकाल(Indian Press emergency 1975) लगा था। जब देश के हर नागरिक के अधिकार छीन लिए गए थे। इसका सबसे क्रूर प्रहार प्रेस की आज़ादी पर हुआ था। रात के अंधेरे में आज़ाद आवाज़ को खामोश करने की साज़िश रची गई। आइए जानते हैं उस ‘काले दिवस’ (Black Day of Press) की पूरी कहानी।

अखबारों के दफ्तरों की बिजली काटी, कलम पर लगाया पहरा

25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल लागू हुआ। सरकार का पहला निशाना देश के मीडिया हाउस बने। दिल्ली के प्रमुख अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। सरकार नहीं चाहती थी कि सुबह अखबार छपकर जनता तक पहुंचें। आज़ाद भारत में पहली बार प्रेस का गला घोंटा गया था। इसके तुरंत बाद देश में केंद्रीय सेंसरशिप लागू कर दी गई।

सेंसर’ की कैंची और सरकार की तानाशाही

आपातकाल के दौरान अखबार अपनी मर्जी से कुछ नहीं छाप सकते थे। इसके नियम बेहद सख्त और क्रूर थे। हर खबर को छपने से पहले सरकारी अधिकारी को दिखाना पड़ता था। सरकार विरोधी खबरों पर तुरंत सेंसर की कैंची चल जाती थी। जो पत्रकार सरकार के आगे नहीं झुके, उन्हें जेल में डाल दिया गया। सरकार मीडिया को अपना गुलाम बनाना चाहती थी।

तभी आज़ाद भारत में सत्ता की बेड़ी पहने प्रेस की एक कॉन्फ्रेंस में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था:

“जब मीडिया को झुकने कहा गया, तो वो रेंगने लगे।”

विरोध का अनोखा तरीका: खाली छोड़ दिए संपादकीय पन्ने

जब सच लिखने पर पाबंदी लगी, तो अखबारों ने नया रास्ता चुना। कई मीडिया अख़बारों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने विरोध में अपने संपादकीय पन्ने (Editorial Pages) पूरी तरह खाली छोड़ दिए। यह खाली पन्ना बिना कुछ बोले ही सब बयां कर रहा था। जनता समझ गई कि अब देश में सच लिखने की आज़ादी नहीं है। कई बड़े संपादकों को जेल हुई, लेकिन कलम नहीं झुकी।

Indian Press Emergency 1975 Black Day Censorship
Black day of democracy
आज के डिजिटल दौर में 1975 का सबसे बड़ा सबक

आज मीडिया का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। प्रिंट से शुरू हुआ सफर आज डिजिटल और सोशल मीडिया तक आ गया है। लेकिन 1975 का यह ‘काला दिवस’ आज भी एक बड़ा सबक है। यह दिन हमें प्रेस की आज़ादी की कीमत याद दिलाता है। लोकतंत्र तभी तक जीवित है, जब तक मीडिया में सवाल पूछने की हिम्मत है।

बड़ा सवाल

क्या 1975 का वो काला दौर आज सच में खत्म हो चुका है? आज न बिजली काटी जाती है! न अखबारों के पन्ने खाली छूटते हैं। लेकिन सच लिखने और दिखाने की कीमत आज भी उतनी ही बड़ी है। वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत की रैंकिंग लगातार गिर रही है। कॉरपोरेट का दबाव और सच बोलने पर मुकदमों का डर आज का नया ‘सेंसर’ बन चुका है। सत्ता कोई भी हो, सवाल पूछने वाली कलम हमेशा उसकी आंखों में खटकती है। सोचना आपको है, क्या हम सचमुच आज़ाद हैं, या सिर्फ पाबंदियों का तरीका बदल गया है?इसलिए घट रही है श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी

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  2. Avika Maurya अवतार
    Avika Maurya

    A powerful reminder of a dark chapter. The silent protest of leaving editorial pages blank will always stand as an iconic symbol of journalistic resistance. A free press is the backbone of democracy.

  3. Avika Maurya अवतार
    Avika Maurya

    Good write-up, The Eagle Media. I actually didn’t know about the whole blank pages protest thing. Thanks for sharing this.

  4. Dev Runwal अवतार

    लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला किसी भी सभ्य समाज के लिए एक काला दिन है। सच की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। 🖤 #MediaFreedom #BlackDayOfPress”….

  5. Avika Maurya अवतार
    Avika Maurya

    An eye-opening article…Remembering the ‘Black Day’ of the press is so important if we want to protect free speech today. The comparison between the outright censorship of 1975 and the subtle, systemic pressures faced by modern journalists is spot on. Thank you for this bold and honest journalism.

  6. Saroj Dwivedi अवतार
    Saroj Dwivedi

    ​”बहुत ही धारदार और कड़वा सच! आपने बिल्कुल सही कहा कि पहले सेंसरशिप दिखती थी, लेकिन आज वह अदृश्य है। आज अखबारों के पन्ने खाली नहीं छोड़े जाते, बल्कि उन्हें प्रायोजित (sponsored) और भ्रामक खबरों से भर दिया जाता है ताकि जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटक जाए। सत्ता और पूंजीपतियों का गठजोड़, मुकदमों का डर और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग आज के नए हथियार हैं। पाबंदियों का सिर्फ तरीका बदला है, नीयत नहीं। एक बेहद प्रासंगिक लेख!”

  7. Parth Shukla अवतार
    Parth Shukla

    “बेहद सटीक और विचारणीय लेख !

    यह बिल्कुल सच है कि 1975 के आपातकाल का वह दौर खत्म हो चुका है, जहाँ सरकारें सीध े तौर पर अखबारों के पन्नों पर कैंची चलाती थीं। लेकिन आज सेंसरशिप का तरीका प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष और मनोवैज्ञानिक हो गया है। आज के दौर में कॉरपोरेट हाउस का मीडिया पर नियंत्रण, कानूनी मुकदमों (Defamation/SLAPP suits) का डर और विज्ञापनो ं का दबाव ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ (Self-censorship) को बढ़ावा दे रहा है।

  8. Parth Shukla अवतार
    Parth Shukla

    “बेहद सटीक और विचारणीय लेख !

    यह बिल्कुल सच है कि 1975 के आपातकाल का वह दौर खत्म हो चुका है, जहाँ सरकारें सीधे तौर पर अखबारों के पन्नों पर कैंची चलाती थीं। लेकिन आज सेंसरशिप का तरीका प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष और मनोवैज्ञानिक हो गया है। आज के दौर में कॉरपोरेट हाउस का मीडिया पर नियंत्रण, कानूनी मुक़दमे डर और विज्ञापनों का दबाव ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ (Self-censorship) को बढ़ावा दे रहा है।

    वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की गिरती रैंकिंग इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज़ादी के मायने भले ही बदल गए हों, लेकिन सच बोलने वालों के लिए चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। जब तक कलम सत्ता और कॉरपोरेट के दबाव से पूरी तरह मुक्त नहीं होती, तब तक असली मायने में लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ आज़ाद नहीं कहला सकता। सोचने का वक्त वाकई आ गया है।

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