सोशल मीडिया का दौर – क्या मानसिक स्वास्थ्य भी बन गया है एक Trend ?

लेखक वांशिका रणासरा । द ईगल मीडिया

सोशल मीडिया से बढ़ी जागरूकता, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य..

21 वीं सदी के लोग पहले से कहीं अधिक जागरूक है। मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय जिन पर कभी खुलकर बात नहीं होती थी, आज सोशल मीडिया के जरिए हर घर तक पहुँच रहे हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। लोग अब अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय, ज़रूरत पड़ने पर मदद लेने से भी नहीं हिचकिचाते!

क्या मानसिक स्वास्थ्य भी बन रहा है एक TREND..?

आज इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो और वायरल पोस्ट में Depression, anxiety, overthinking और mental health जैसे शब्द ऐसे इस्तेमाल होते हैं जैसे पहले के युग में छोटी सी भूल होने पर पागल, बेवकूफ और गधा। किन्तु न पहले वो सही था न अब। कई युवा अपनी सामान्य भावनाओं को गंभीर मानसिक बीमारी का नाम देकर अपने दायित्वों से भागना पसंद करते हैं। जरा सा व्यावसायिक तनाव क्या हुआ उसे डिप्रेशन रूपी गंभीर बीमारी बता देना। साफ- सफाई की आदतों को OCD (मनोग्रसित-बाध्यता विकार) का नाम दे देना। यही कुछ वजह हैं कि आज की जनरेशन पहले की तुलना में दवाइयों पर ज्यादा निर्भर है।

आज के युवाओं को है सोशल मीडिया नामक रोग
आज के युवाओं को है सोशल मीडिया नामक रोग

2025 में Acta Psychiatrica Scandinavica द्वारा  प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय report में मानसिक स्वास्थ्य उपचार के लिए आए युवाओं पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि अध्ययन में शामिल लगभग सभी प्रतिभागियों ने इलाज शुरू होने से पहले सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सामग्री देखी थी। साथ ही ऐसे युवाओं में Self-diagnosis यानी बिना विशेषज्ञ की सलाह के खुद को मानसिक बीमारी से ग्रस्त मान लेने की प्रवृत्ति अधिक थी। हालांकि report में इस बात का उल्लेख था कि कि जारी आंकड़ों का अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया सीधे मानसिक बीमारी पैदा करता है, बल्कि यह भ्रम और गलत आत्म-निदान (Self-diagnosis) को बढ़ावा दे सकता है।

हर तनाव एंग्जायटी डिसऑर्डर नहीं होता। परीक्षा का दबाव, रिश्तों में मतभेद, करियर की चिंता या किसी असफलता के बाद कुछ समय तक दुखी महसूस करना जीवन का सामान्य हिस्सा है। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति किसी मानसिक बीमारी से गुजर रहा है !!

सोशल मीडिया डॉक्टर नहीं है

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के यूरोपीय क्षेत्र द्वारा 2024 में जारी HBSCके ताज़ा शोध में 2022 एवं 2018 के तुलनात्मक आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि किशोरों में ‘Problematic social media use’ के 4% केसों की उछाल हैं। जहां 2018 में 7% किशोर problematic social media use’ का शिकार थे वहीं 2022 में 11% हो गए। अर्थात 11% किशोर सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। जिसका असर उनकी पढ़ाई, नींद तथा रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा था। सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड की वीडियो या पोस्ट किसी डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकती। कई बार लोग बिना विशेषज्ञ की सलाह के खुद ही अपने लक्षणों का daनिष्कर्ष कर लेते हैं। इससे अनावश्यक डर पैदा होता है और वास्तविक समस्या होने पर सही इलाज लेने में भी देरी हो सकती है।

इस trend का दूसरा नुकसान!

इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कुछ लोग केवल इसलिए वास्तविक मानसिक समस्याओं को हल्के में लेने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि “आजकल तो हर कोई डिप्रेशन बोल देता है।” यह सोच उन लोगों के लिए नुकसानदायक है जो सच में मानसिक बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। किन्तु वे इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं की वे कितनी गंभीर समस्या से गुजर रहे हैं।

निष्कर्ष – जागरूक बनें लेकिन संतुलित सोच रखें!

मानसिक स्वास्थ्य कोई ट्रेंड नहीं, बल्कि हमारी सेहत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर भावन बीमारी नहीं होती। खुश होना या ठहाके लगा के हसना पागल होने का संकेत नहीं। या फिर किसी समस्या को लेकर परेशान हो जाना डिप्रेशन नहीं। स्वच्छता बरकरार रखना OCD होना नहीं। और सोशल मीडिया डॉक्टर नहीं। यह सभी एक गंभीर बीमारियाँ हैं। जिनका इलाज लेना अति आवश्यक है। यदि आपको कोई भी अशी किसी भी बीमारी के लक्षण लग रहे हैं, तो बिना किसी देरी के चिकित्सकीय सलाह लें। सोशल मीडिया या यूट्यूब आपको भ्रमित कर सकता है। साधारण दैनिक जीवनी की सलाह के लिए सोशल मीडिया सही है लेकिन किसी बीमारी के लिए इंटरनेट नहीं चिकित्सक ही रामबाण उपाय होना चाहिए। जागरूक बनें, संवेदनशील रहें और विशेषज्ञ की मदद लेने में कभी संकोच न करें।

संतुलित जागरूकता की आवश्यकता
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