गुरु (बृहस्पति) को सबसे शुभ ग्रह क्यों माना जाता है?

लेखक हर्षिता नाहर। द ईगल मीडिया

Jupiter को वैदिक ज्योतिष में ‘देवगुरु बृहस्पति’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। वे देवताओं को ज्ञान, नीति, धर्म और सही निर्णय का मार्ग दिखाते हैं। इसी कारण ज्योतिष में गुरु को बुद्धिमत्ता, नैतिकता और शुभता का प्रतीक माना गया है। यह सभी बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

क्या है गुरु बृहस्पति को लेकर ज्योतिषों की मान्यताएं

ज्योतिष के अनुसार गुरु का स्वभाव सात्विक, शांत और कल्याणकारी माना जाता है। कहा जाता है कि जहां गुरु का शुभ प्रभाव होता है, वहां व्यक्ति में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा, धैर्य, ईमानदारी, दया, उदारता और दूसरों का सम्मान करने जैसे गुण बढ़ते हैं। इसलिए इसे केवल धन देने वाला नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला ग्रह भी माना जाता है।गुरु को भाग्य, शिक्षा, उच्च ज्ञान, धर्म, विवाह, संतान, गुरु-शिष्य संबंध, न्याय, सम्मान, आध्यात्मिकता और समृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है।

ज्योतिषियों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु मजबूत हो, तो उसे अच्छे गुरु या मार्गदर्शक मिल सकते हैं, शिक्षा में सफलता मिल सकती है, करियर में उन्नति के अवसर बन सकते हैं, वैवाहिक जीवन में स्थिरता आ सकती है और समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है।एक और कारण यह है कि गुरु को विस्तार (Expansion) का ग्रह माना जाता है।

देवगुरु बृहस्पति
देवगुरु बृहस्पति
भाव या जीवन क्षेत्र में गुरु की दृष्टि पड़ती है

मान्यता है कि जिस भाव या जीवन के क्षेत्र पर गुरु की शुभ दृष्टि पड़ती है, वहां विकास, अवसर और सकारात्मकता बढ़ती है। इसी वजह से इसे समृद्धि और उन्नति का ग्रह भी कहा जाता है।वैदिक ज्योतिष में गुरु की पाँचवीं, सातवीं और नौवीं दृष्टि को विशेष रूप से शुभ माना गया है। कई ज्योतिषियों का मानना है कि यदि गुरु इन भावों पर शुभ दृष्टि डाल रहा हो, तो वह शिक्षा, संतान, विवाह, भाग्य, धर्म और जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम देने की क्षमता रखता है।इसके अलावा, पारंपरिक ज्योतिष में यह भी माना जाता है कि यदि गुरु मजबूत स्थिति में हो, तो वह कुछ हद तक अन्य ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को कम कर सकता है।

हालांकि यह नियम हर कुंडली पर समान रूप से लागू नहीं होता, क्योंकि अंतिम फल पूरी जन्मकुंडली, ग्रहों की स्थिति, दशा और गोचर पर निर्भर माना जाता है।इसीलिए वैदिक ज्योतिष में एक कहावत प्रचलित है .. “गुरु बलवान तो भाग्य बलवान।” अर्थात यदि गुरु अनुकूल हो, तो जीवन के कई क्षेत्रों में शुभ अवसर और संतुलन मिलने की संभावना मानी जाती है।

जानते है गुरु को बलवान कैसे किया जाए..
  • गुरुवार का व्रत रखें और भगवान विष्णु या बृहस्पति की पूजा करें।
  • पीले रंग का अधिक उपयोग करें, जैसे पीले वस्त्र पहनना या पूजा में पीले फूल चढ़ाना
  • पीली दाल, हल्दी, चने की दाल, केले या पीले वस्त्र का दान जरूरतमंदों या योग्य ब्राह्मण को करना शुभ माना जाता है।
  • “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप गुरुवार को करना शुभ माना जाता है।
  • गुरु, माता-पिता, शिक्षकों और बुजुर्गों का सम्मान करें। ज्योतिष में इसे गुरु ग्रह को प्रसन्न करने का सबसे प्रभावी उपाय माना गया है।
  • ईमानदारी, सत्य और दान-पुण्य का पालन करें। गुरु को धर्म और सदाचार का ग्रह माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और सत्संग में भाग लेना भी शुभ माना जाता है।गुरु का रत्न Yellow Sapphire (Pukhraj) को गुरु का रत्न माना जाता है, लेकिन इसे हर व्यक्ति को नहीं पहनना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार इसे पहनने से पहले किसी अनुभवी ज्योतिषी या पण्डित से अपनी जन्मकुंडली का विश्लेषण कराना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि गलत रत्न लाभ के बजाय प्रतिकूल परिणाम भी दे सकता है.

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